“मिडिल ईस्ट में अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच बढ़ते संघर्ष से कच्चे तेल की कीमतें सोमवार को 10% से अधिक उछल गईं। ब्रेंट क्रूड 79 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार कर रहा है, जबकि WTI 72 डॉलर के स्तर पर पहुंच गया। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने से सप्लाई चेन बाधित हुई है, जिससे विशेषज्ञों का अनुमान है कि यदि तनाव लंबा चला तो भाव 100 डॉलर से ऊपर और चरम स्थिति में 150 डॉलर तक जा सकता है। भारत जैसे आयात-निर्भर देशों में पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ने का जोखिम बढ़ गया है।”
मिडिल ईस्ट में तनाव से कच्चे तेल की कीमतों में लगी आग, 10% की ताबड़तोड़ उछाल; 150 डॉलर के ऊपर जा सकता है भाव
ग्लोबल एनर्जी मार्केट में भू-राजनीतिक संकट ने सोमवार को भारी उथल-पुथल मचा दी। अमेरिका और इजराइल की ओर से ईरान पर बड़े पैमाने पर हवाई हमलों के बाद तेहरान की जवाबी कार्रवाई ने पूरे क्षेत्र को युद्ध की चपेट में ला दिया। इस संघर्ष के चलते स्ट्रेट ऑफ होर्मुज – दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्ग – में जहाजों की आवाजाही लगभग ठप हो गई है। इस चोकपॉइंट से रोजाना करीब 20 मिलियन बैरल तेल की सप्लाई होती है, जो वैश्विक कुल का एक-पांचवां हिस्सा है।
सोमवार को ट्रेडिंग शुरू होते ही ब्रेंट क्रूड फ्यूचर्स में 13% तक की तेजी देखी गई, जो 82.37 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया – जनवरी 2025 के बाद का उच्चतम स्तर। बाद में कुछ मुनाफावसूली के साथ यह 79 डॉलर के आसपास स्थिर हुआ, जो पिछले शुक्रवार के बंद से लगभग 8-9% अधिक है। इसी तरह WTI क्रूड में 8-9% की बढ़त दर्ज की गई, जो 72 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर ट्रेड कर रहा है।
यह उछाल मुख्य रूप से सप्लाई डिसरप्शन की आशंका से जुड़ा है। ईरान के जवाबी हमलों में कई जहाजों पर हमला हुआ, जिससे टैंकर ट्रैफिक रुक गया। कई शिपिंग कंपनियां अब होर्मुज से बचकर लंबे रास्ते अपना रही हैं, जिससे ट्रांसपोर्टेशन कॉस्ट बढ़ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह मार्ग लंबे समय तक बंद रहा तो वैश्विक तेल सप्लाई में 15-20% की कमी आ सकती है।
भारत पर असर भारत अपनी 85% से अधिक तेल जरूरतें आयात करता है, जिसमें मिडिल ईस्ट का हिस्सा सबसे बड़ा है। कीमतों में यह तेजी सीधे पेट्रोल, डीजल, एलपीजी और एविएशन फ्यूल की कीमतों पर असर डालेगी। पिछले कुछ महीनों में स्थिर रहने के बाद अब पेट्रोल-डीजल में 5-10 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी का अनुमान है, यदि भाव 85-90 डॉलर के स्तर पर स्थिर हो जाता है।
संभावित परिदृश्य और स्तर
यदि संघर्ष सीमित रहा और होर्मुज जल्द खुला: ब्रेंट 80-85 डॉलर के बीच स्थिर हो सकता है।
यदि हमले जारी रहे और सप्लाई 10-15 दिनों तक प्रभावित: भाव 100 डॉलर के पार जा सकता है।
चरम स्थिति (पूर्ण ब्लॉकेड या बड़े ऑयल फील्ड्स पर हमला): 120-150 डॉलर तक का स्काईरॉकेट संभव, जैसा कि 2008 में देखा गया था।
विश्लेषकों का कहना है कि ओपेक+ देशों के पास अतिरिक्त उत्पादन क्षमता है, लेकिन सऊदी अरब और यूएई जैसे उत्पादक भी क्षेत्रीय अस्थिरता से प्रभावित हो सकते हैं। अमेरिका ने अपनी स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व से रिलीज की बात कही है, लेकिन यह अल्पकालिक राहत ही देगा।
भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए चुनौतियां
मुद्रास्फीति में तेजी: तेल महंगा होने से ट्रांसपोर्ट, खाद्य और मैन्युफैक्चरिंग कॉस्ट बढ़ेगी।
रुपया पर दबाव: डॉलर में तेल खरीदने से आयात बिल बढ़ेगा, जिससे करेंसी कमजोर हो सकती है।
स्टॉक मार्केट: एनर्जी शेयरों में तेजी, लेकिन ओवरऑल सेल-ऑफ की आशंका।
वैश्विक बाजारों में भी असर दिख रहा है – एशियाई शेयर बाजार गिरावट के साथ खुले, जबकि गोल्ड और नैचुरल गैस में भी तेजी आई है। निवेशक अब अमेरिका और ईरान के अगले कदम पर नजरें टिकाए हुए हैं। यदि डिप्लोमेसी कामयाब नहीं हुई तो तेल बाजार में और उथल-पुथल तय है।










